Politicians Hospital Drama: देश की राजनीति में एक अजीब सी बीमारी फैली हुई है. यह बीमारी चुनावी मौसम में नहीं, न ही रैलियों की धूल-धक्कड़ से होती है. यह बीमारी अचानक गिरफ्तारी के बाद प्रकट होती है. जैसे ही किसी नेता के हाथों में हथकड़ी लगती है, वैसे ही ब्लड प्रेशर आसमान छूने लगता है, शुगर बेलगाम हो जाती है और छाती में “असहनीय” दर्द उठने लगता है.
कल तक मंच पर जोश, आज वीआईपी वार्ड में होश
हैरानी की बात यह है कि यही नेता कल तक मंच से गरज-गरजकर भाषण दे रहा था, घंटों खड़ा रहकर जनता को क्रांति का पाठ पढ़ा रहा था. लेकिन आज एक एफआईआर और एक गिरफ्तारी ने उसे ऐसा बीमार बना दिया कि सीधे सरकारी अस्पताल से वीआईपी वार्ड तक का सफर तय हो जाता है.
गिरफ्तारी और मेडिकल इमरजेंसी का अटूट रिश्ता
दरअसल, भारत में गिरफ्तारी के साथ मेडिकल इमरजेंसी का अटूट रिश्ता है. कानून कहता है कि किसी भी गिरफ्तार व्यक्ति का मेडिकल टेस्ट जरूरी है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि पुलिस हिरासत में उसके साथ कोई अमानवीय व्यवहार न हो. नियम सही है, मंशा भी नेक है, लेकिन व्यावहारिक राजनीति ने इसे “स्वास्थ्य सुरक्षा कवच” में बदल दिया है.
जांच एजेंसी की गाड़ी आते ही जाग जाती हैं पुरानी बीमारियां
नेताओं की बीमारियों की टाइमिंग भी कमाल की होती है. ईडी, सीबीआई या पुलिस की गाड़ी आते ही पुरानी फाइलों के साथ-साथ पुरानी बीमारियां भी जाग जाती हैं. डॉक्टरों की पर्चियों में ऐसे-ऐसे मेडिकल शब्द लिखे जाते हैं कि आम आदमी गूगल खोलने को मजबूर हो जाए.
अदालत से पहले अस्पताल: मेडिकल रिपोर्ट का ‘चमत्कारी’ सच
सबसे दिलचस्प दृश्य तब होता है जब अदालत में पेशी से पहले मेडिकल रिपोर्ट पेश की जाती है. रिपोर्ट पढ़कर लगता है कि यह कोई आरोपी नहीं, बल्कि मेडिकल चमत्कार है, जो भाषण दे सकता है, चुनाव लड़ सकता है, लेकिन जेल की हवा नहीं खा सकता.
नियम एक, इलाज अलग: नेता बनाम आम नागरिक
यहां सवाल नेताओं की बीमारी पर नहीं, बराबरी के इलाज पर है. वही नियम आम आदमी पर भी लागू होते हैं, लेकिन उसकी तबियत अक्सर “एडजस्टेबल” मानी जाती है. नेता के लिए स्ट्रेचर, आम नागरिक के लिए लाठीचार्ज के बाद भी ‘ऑल इज वेल’.
दो तरह की सेहत, एक देश: यही है असली व्यंग्य
व्यंग्य यही है कि इस देश में सेहत भी दो वर्गों में बंटी हुई है- एक आम नागरिक की और दूसरी गिरफ्तारी के बाद नेता की. काश, सत्ता और सिस्टम की यही संवेदनशीलता हर नागरिक की बीमारी पर भी दिखाई देती. तब शायद अस्पतालों के बाहर लंबी कतारें कम होतीं और न्यायालयों के भीतर लोगों का भरोसा कहीं अधिक मजबूत होता.
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