UPI Payment Issue: यदि आपका खाता किसी सरकारी बैंक में है और आप रोजमर्रा के लेन-देन के लिए यूपीआई का इस्तेमाल करते हैं, तो यह खबर आपके अनुभव से जुड़ी हो सकती है. डिजिटल इंडिया के दौर में जहां सरकार कैशलेस ट्रांजैक्शन को बढ़ावा दे रही है, वहीं कई बैंक अपने ही ग्राहकों के ऑनलाइन पेमेंट पर अस्थायी रोक लगाकर परेशानी खड़ी कर रहे हैं.
तीसरे-चौथे ट्रांजैक्शन पर अचानक डिक्लाइन की समस्या
फोनपे, गूगलपे, पेटीएम जैसे यूपीआई प्लेटफॉर्म का उपयोग करने वाले ग्राहकों को इन दिनों एक अजीब समस्या का सामना करना पड़ रहा है. यदि कोई ग्राहक कम समय में लगातार दो-तीन पेमेंट करता है, तो चौथे ट्रांजैक्शन पर बैंक की ओर से पेमेंट डिक्लाइन कर दिया जाता है. उदाहरण के तौर पर, यदि आप बाजार में सब्जी खरीदते समय पहले आलू, फिर प्याज और उसके तुरंत बाद टमाटर का भुगतान करते हैं, तो संभव है कि तीसरा या चौथा पेमेंट असफल हो जाए. बैंक इसे “सुरक्षा कारणों” से उठाया गया कदम बताता है, लेकिन इससे ग्राहकों को असहज स्थिति का सामना करना पड़ता है.
फेल्ड पेमेंट के बाद बैंक की ऑटोमैटिक वेरिफिकेशन कॉल
इतना ही नहीं, फेल्ड ट्रांजैक्शन के बाद बैंक की ओर से कम्प्यूटरीकृत कॉल आती है, जिसमें हर असफल पेमेंट की पुष्टि कराई जाती है. कई बार यह प्रक्रिया लंबी और झुंझलाहट भरी साबित होती है. सवाल यह है कि जब ग्राहक खुद अपने पैसों का उपयोग कर रहा है, तो बार-बार रोक क्यों?
साइबर फ्रॉड रोकने में बैंक क्यों हो रहे हैं नाकाम?
दूसरी तरफ, जब असली साइबर फ्रॉड की घटनाएं होती हैं, जैसे किसी फर्जी लिंक या मैलवेयर के जरिए अकाउंट से रकम उड़ा ली जाती है, तब बैंक अक्सर समय पर कार्रवाई करने में नाकाम दिखते हैं. कई मामलों में ग्राहक शिकायत दर्ज कराते रह जाते हैं, लेकिन पैसा वापस मिलना मुश्किल हो जाता है.
ग्राहक सुविधा और सुरक्षा के बीच संतुलन की जरूरत
ऐसे में, यह बहस तेज हो गई है कि क्या बैंक की सुरक्षा व्यवस्था सही दिशा में काम कर रही है? क्या ग्राहकों की सुविधा और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की जरूरत नहीं है? डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के साथ-साथ बैंकों को ऐसी तकनीक विकसित करनी होगी जो वास्तविक फ्रॉड को रोके, न कि अपने ही ग्राहकों के वैध लेन-देन में बाधा डाले.
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