Friday, March 6, 2026
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श्रीराम से जुड़ी है दीपावली की परंपरा, तो क्यों की जाती है लक्ष्मी-गणेश की पूजा?

History and Significance of Diwali: देशभर में दीपावली का पर्व इस बार सोमवार, 20 अक्टूबर को धूमधाम से मनाया जाएगा. इस दिन लोग अपने घरों को सजाते हैं, दीप जलाते हैं और भगवान गणेश व माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करते हैं. हर वर्ष कार्तिक मास की अमावस्या को दीपावली का त्योहार मनाया जाता है. लेकिन अक्सर सवाल उठता है कि यदि दीपावली श्रीराम के अयोध्या लौटने की स्मृति में मनाई जाती है, तो फिर इस दिन लक्ष्मी-गणेश पूजा क्यों की जाती है? इसके पीछे भी एक गहरी धार्मिक कथा और प्राचीन परंपरा जुड़ी है.

दीपावली की जड़ें भगवान राम से, लेकिन पूजन का विधान लक्ष्मी से
हिंदू शास्त्रों में कार्तिक अमावस्या के दिन लक्ष्मी पूजा का विधान बहुत पुराना है. यह परंपरा भगवान विष्णु के राम अवतार से भी पहले की है. दरअसल, सतयुग में देवताओं और असुरों के बीच हुए समुद्र मंथन से 14 रत्न निकले थे, जिनमें महालक्ष्मी भी थीं. इस दिन कार्तिक माह की अमावस्या तिथि थी. हालांकि, कई कहानियों में मां लक्ष्मी का प्रकट दिवस शरद पूर्णिमा को माना जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, कार्तिक अमावस्या की रात माता लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं. इस दिन वह ऐसे घरों में प्रवेश करती हैं जो स्वच्छ, प्रकाशमान और श्रद्धा से भरे होते हैं.

इसलिए दीपावली की रात घरों की सफाई, सजावट और दीप जलाने की परंपरा है. माना जाता है कि जहां उजाला, पवित्रता और सकारात्मक ऊर्जा होती है, वहीं लक्ष्मी स्थायी रूप से निवास करती हैं. इसलिए कार्तिक अमावस्या को लक्ष्मी पूजन का विशेष महत्व है. समुद्र मंथन से ही धन्वंतरि भगवान भी प्रकट हुए थे, जो अमृत कलश लेकर निकले थे. इसी कारण धनतेरस के दिन उनकी पूजा की जाती है.

लक्ष्मी के साथ गणेश पूजन का रहस्य
दीपावली पर लक्ष्मी के साथ गणेश जी की पूजा का भी विशेष कारण है. माता लक्ष्मी का जन्म जल से हुआ था और जल का स्वभाव है निरंतर प्रवाह. इसी तरह लक्ष्मी भी स्थिर नहीं रहतीं, वे उस व्यक्ति या स्थान पर अधिक देर तक नहीं ठहरतीं, जहां बुद्धि और संयम का अभाव हो. गणेश जी ‘विघ्नहर्ता’ होने के साथ-साथ बुद्धि और विवेक के देवता हैं. इसलिए लक्ष्मी को स्थिर रखने के लिए पहले गणेश की पूजा की जाती है.

एक ही दिन दो पौराणिक घटनाएं
शास्त्रों के अनुसार, समुद्र मंथन की घटना सतयुग की है, जबकि भगवान राम का लंका विजय के बाद अयोध्या आगमन त्रेता युग में हुआ. संयोगवश दोनों ही घटनाएं कार्तिक अमावस्या के दिन हुईं. इसी वजह से इस दिन को दीपावली के रूप में मनाया जाता है. जहां एक ओर यह राम के आगमन और प्रकाश की विजय का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर लक्ष्मी और गणेश की पूजा समृद्धि और स्थिरता का संदेश देती है. अयोध्यावासियों ने जब श्रीराम के स्वागत में दीप प्रज्ज्वलित किए थे, तब से यह परंपरा आज तक चली आ रही है.

यह भी देखें- Whole Kit 71 Items – पूरी दिवाली पूजा सामग्री एक ही बॉक्स में | लक्ष्मी गणेश पूजा किट

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