Friday, March 6, 2026
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SBI की लोन वसूली में मनमानी! RBI के नियम ताक पर, फर्जी लीगल नोटिसों से बढ़ी कर्जदारों की मुश्किलें

SBI Loan Recovery: देश की सबसे बड़ी बैंकिंग संस्था State Bank of India (SBI) पर हाल के दिनों में कर्जदारों के साथ अपनाए जा रहे रिकवरी के तरीकों को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. कई ग्राहकों ने आरोप लगाया है कि बैंक की ओर से वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए बिना, डराने-धमकाने वाले और कभी-कभी फर्जी प्रतीत होने वाले “लीगल नोटिस” भेजे जा रहे हैं. इन नोटिसों का उद्देश्य केवल दबाव बनाना होता है, न कि विवाद का पारदर्शी समाधान. सोशल मीडिया और स्थानीय शिकायतों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिससे यह प्रश्न उठता है कि क्या बैंक और उसके एजेंट वास्तव में RBI के निर्देशों का पालन कर रहे हैं.

RBI की गाइडलाइन्स और बैंक की जिम्मेदारी
RBI की गाइडलाइन्स के अनुसार, रिकवरी प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की अपमानजनक, धमकीभरी या जबरदस्ती की रणनीति पूरी तरह प्रतिबंधित है. नियमों में स्पष्ट किया गया है कि एजेंटों को वैध पहचान पत्र और प्राधिकरण पत्र साथ रखना चाहिए, संपर्क का समय सुबह 8 बजे से शाम 7 बजे तक सीमित है और कर्जदार की निजता व गरिमा का सम्मान अनिवार्य है. किसी भी प्रकार की सार्वजनिक बेइज्जती या धमकी की स्थिति में बैंक जिम्मेदार होगा. फिरभी, कई रिपोर्टों में घर पर अचानक पहुंचना, अनावश्यक कॉल-मैसेज और कथित कानूनी नोटिसों के जरिए दबाव डालने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं.

डिजिटल प्लेटफार्मों पर फर्जी नोटिस और ब्लैकमेल
सिर्फ मानसिक दबाव ही नहीं, बल्कि डिजिटल प्लेटफार्मों और ऐप्स के माध्यम से ठगी और ब्लैकमेल के मामले भी बढ़ रहे हैं. इनमें जानबूझकर तैयार किए गए फर्जी नोटिस और झूठे रिकवरी सिस्टम शामिल हैं. इस तरह की घटनाएं न केवल कर्जदारों का मानसिक तनाव बढ़ाती हैं, बल्कि बैंकिंग प्रणाली पर जनता के भरोसे को भी कमजोर करती हैं. कई मामलों में पुलिस ने ऐसे एजेंटों और दुरुपयोग करने वालों के खिलाफ कार्रवाई भी की है.

ताजा मामला बिहार का
बिहार के आरा शहर के रहने वाले विशाल सिन्हा (परिवर्तित नाम) का मामला इस समस्या का ताजा उदाहरण है. उन्होंने लगभग दो वर्ष पहले SBI के क्रेडिट कार्ड से खरीदारी की और बाद में उसी कार्ड पर कैश लोन लिया. कुल मिलाकर कर्ज की राशि लगभग 5 लाख रुपये थी, जिसका भुगतान उन्होंने 18 महीनों तक EMI में नियमित रूप से किया.

बैंक को समय देने का अनुरोध
व्यवसाय में हुए घाटे और आर्थिक संकट के कारण, अप्रैल 2025 में विशाल ने बैंक को लिखित रूप से सूचित किया कि वे नवंबर 2025 तक अपनी किस्तों का भुगतान करने में असमर्थ हैं और इस अवधि तक अतिरिक्त समय देने का अनुरोध किया.

बैंक की ओर से दबाव और धमकियां
बैंक की ओर से विशाल को किसी प्रकार की राहत देने के बजाय लगातार कॉल्स आने लगीं. अप्रैल के अंत में उन्हें ईमेल से डिमांड नोटिस भेजा गया, जिसमें 15 दिनों के भीतर भुगतान न करने पर “आर्बिट्रेशन” प्रक्रिया शुरू करने की चेतावनी दी गई. विशाल ने जवाब दिया कि मध्यस्थ की नियुक्ति उनकी सहमति के बिना की गई है, जो आर्बिट्रेशन एक्ट के नियमों के खिलाफ है. इसके बावजूद, 14 अगस्त 2025 को उन्हें व्हाट्सएप और SMS के जरिए एक और नोटिस मिला, जिसमें 7 दिनों में भुगतान न करने पर क्रिमिनल कंप्लेंट दर्ज करने की धमकी दी गई. कुछ दिनों बाद रिकवरी एजेंट बिना पहचान पत्र और प्राधिकरण के उनके घर भी पहुंचे.

लोक अदालत और आर्बिट्रेशन नोटिस की अनियमितताएं
13 सितंबर 2025 को विशाल को लोक अदालत का नोटिस ईमेल से भेजा गया, जिसमें तारीखें उलझी हुई थीं और किसी स्थान या कोर्ट का उल्लेख नहीं था. उसी दिन एक और ईमेल में बताया गया कि उनके खिलाफ आर्बिट्रेशन अवार्ड पास हो चुका है और सात दिनों में भुगतान न करने पर मामला कोर्ट में भेजा जाएगा.

चूंकि, लोक अदालत के नोटिस में तारीख 13 अगस्त 2025 अंकित थी, जबकि नोटिस भेजने की वास्तविक तारीख 13 सितंबर 2025 थी, ऐसे में विशाल को संदेह हुआ. संदेह का एक बड़ा कारण यह भी था कि लोक अदालत का आयोजन 13 सितंबर को ही किया जाना था. ऐसे में, विशाल ने अपने घर के पास रहने वाले सिविल मामलों के अधिवक्ता से परामर्श लिया. वकील ने नोटिस की बारीकी से जांच की और पाया कि दस्तावेज में कई त्रुटियां और फर्जी सामग्री थीं.

वहीं, आर्बिट्रेशन की प्रक्रिया शुरू किए बिना ही अवार्ड पास कर दिया गया था. यानी कर्जदार को आर्बिट्रेशन के लिए निर्धारित तिथि के बारे में किसी माध्यम से जानकारी तक नहीं दी गई थी.

कर्जदार ने दर्ज कराई शिकायत 
विशाल ने अपने लीगल एडवाइजर से परामर्श लेने के बाद 13 सितंबर 2025 को SBI के कस्टमर केयर ईमेल पर पूरे मामले की शिकायत दर्ज कराई. 3 अक्टूबर 2025 तक कोई समाधान नहीं मिला. इसके बाद उन्होंने दोबारा शिकायत भेजी, लेकिन 18 अक्टूबर 2025 तक भी कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला या किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं हुई.

RBI नियमों का उल्लंघन
RBI के नियमों के अनुसार, जब कोई कर्जदार अपने लोन से संबंधित किसी मामले की शिकायत दर्ज कराता है, तो समाधान तक बैंक को रिकवरी का अधिकार नहीं होता. इसके बावजूद, विशाल की शिकायत दर्ज हुए एक माह से अधिक समय बीत जाने के बाद भी कोई समाधान या स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं मिली.

अप्रत्याशित दबाव और पुलिस शिकायत का इरादा
इसी बीच, 11 अक्टूबर 2025 को अचानक सात लोग विशाल के घर पहुंचे और लोन का सेटलमेंट करवाने के लिए दबाव बनाने लगे, जिससे विशाल के परिवार में भय और असुरक्षा का माहौल पैदा हो गया है. विशाल ने कहा कि यदि लगातार शिकायत के बावजूद बैंक कोई कार्रवाई नहीं करता, तो वे नजदीकी पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज कराएंगे.

अनदेखी और मनमानी से बिगड़ रहा भरोसा
यह मामला इस बात का उदाहरण है कि कैसे नियमों की अनदेखी और एजेंटों की मनमानी आम कर्जदारों को परेशान कर रही है. इस तरह का मामला सिर्फ विशाल तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर से ऐसे कई उदाहरण सामने आते रहते हैं. बैंकों के रिकवरी एजेंट खुलेआम आरबीआई के दिशानिर्देशों का उल्लंघन कर रहे हैं. अधिकांश एजेंटों के पास DRA (डेब्ट रिकवरी एजेंट) का प्रमाणपत्र तक नहीं होता. वे बिना पूर्व सूचना दिए सीधे कस्टमर के घर पहुंच जाते हैं. जब ग्राहक उनसे होम विजिट लेटर या आधिकारिक पहचान पत्र दिखाने को कहते हैं, तो उनके पास कोई संतोषजनक जवाब नहीं होता. विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी घटनाओं पर RBI और बैंक प्रशासन को सख्ती से निगरानी करनी चाहिए, ताकि बैंकिंग सिस्टम में जनता का भरोसा बना रहे और कर्ज वसूली कानूनी दायरे में ही की जाए.

बैंकिंग पारदर्शिता और शिकायत निवारण
विशेषज्ञों का सुझाव है कि बैंक अपनी रिकवरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाएं, यानी रिकवरी एजेंटों की सूची सार्वजनिक करें, लिखित नोटिसों का रिकॉर्ड रखें और शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत करें. कर्जदारों को चाहिए कि ऐसे नोटिस मिलने पर शांति से बैंक शाखा से लिखित पुष्टि लें और जरूरत पड़ने पर RBI ऑम्बड्समैन या स्थानीय उपभोक्ता न्यायालय में शिकायत करने से न हिचकें. यदि मामले में बैंक या एजेंट द्वारा नियमों का उल्लंघन सिद्ध होता है, तो नियामक कार्रवाई संभव है.

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