Friday, March 6, 2026
spot_img
Homeधर्मजब सूर्यदेव ने असुर को दिया अपना पुत्र बनने का वरदान, जानिए...

जब सूर्यदेव ने असुर को दिया अपना पुत्र बनने का वरदान, जानिए छठ पूजा से जुड़ी कर्ण की कहानी

Chhath Puja and Story of Karna: छठ पूजा भारत के सबसे पवित्र और प्राचीन पर्वों में से एक है, जो विशेष रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाती है. यह पर्व सूर्य देव और छठी मैया की उपासना के लिए प्रसिद्ध है. चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व में व्रती कठिन निर्जल उपवास रखकर सूर्य की आराधना करते हैं. मान्यता है कि छठ पूजा करने से व्यक्ति के पाप नष्ट होते हैं, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.

छठ पूजा की जड़ें महाभारत काल तक जाती हैं. इस पावन परंपरा का संबंध सूर्यदेव के पुत्र, अंगराज कर्ण से भी जोड़ा जाता है जो अपनी दानवीरता, वीरता और धर्मनिष्ठा के लिए आज भी आदर्श माने जाते हैं. कर्ण का जन्म माता कुंती ने ऋषि दुर्वासा से प्राप्त मंत्र द्वारा सूर्य की उपासना से कराया था. लेकिन सामाजिक परिस्थितियों के कारण कुंती ने नवजात शिशु को नदी में प्रवाहित कर दिया. वह बालक राधा और अधिरथ नामक सारथि दंपत्ति को मिला, जिन्होंने प्रेमपूर्वक उसका पालन-पोषण किया. बचपन से ही कर्ण में सूर्य की दिव्यता और तेज स्पष्ट झलकता था.

पौराणिक कथाओं के अनुसार, कर्ण का पूर्वजन्म भी सूर्यभक्ति से जुड़ा था. कहा जाता है कि वे पूर्वजन्म में दंभोद्भवा नामक असुर थे, जिन्हें सूर्यदेव ने हजार कवच और दिव्य कुंडल का वरदान दिया था. इस वरदान से वह अजेय हो गया और धीरे-धीरे अत्याचारी बन बैठा. तब नर और नारायण ने बारी-बारी से तपस्या कर उसके 999 कवच नष्ट कर दिए. अंतिम कवच के साथ वह सूर्यलोक में जा छिपा. उसकी तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने उसे अगले जन्म में अपना पुत्र बनने का वरदान दिया और वही असुर अगले जन्म में कर्ण के रूप में जन्मे.

जब कर्ण बड़े हुए, तो उनकी मित्रता दुर्योधन से हुई, जिसने उन्हें अंग देश का राजा बनाया. अंग देश का क्षेत्र वर्तमान समय में बिहार के भागलपुर, मुंगेर और उसके आस-पास के इलाकों में स्थित माना जाता है. यहीं कर्ण ने पहली बार छठ पूजा का अनुष्ठान देखा, जिसमें सूर्यदेव और छठी मैया को अर्घ्य अर्पित किया जाता था. सूर्यपुत्र होने के कारण कर्ण स्वयं भी प्रतिदिन सूर्य नमस्कार और अर्घ्यदान करने लगे. उन्होंने इस पूजा के महत्व को समझकर इसे जन-आस्था का हिस्सा बनाया.

इसी प्रकार, अंगराज कर्ण के समय से छठ पूजा की यह परंपरा बिहार और पूर्वांचल की संस्कृति में स्थायी रूप से समाहित हो गई. सूर्यभक्ति, तपस्या और कृतज्ञता का यह पर्व आज भी उसी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है.

यह भी पढ़ें- स्वस्थ जीवन के लिए दैनिक दिनचर्या: छोटी आदतें, बड़ा असर

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments