Bihar Politics: बिहार की राजनीति भी अजीब है. यहां मौसम विभाग भले ही बारिश, गर्मी और ठंड की भविष्यवाणी करे, लेकिन असली मौसम तो नेताओं के बयानों से बदलता है. ताजा उदाहरण मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का है, जिन्होंने अपनी इच्छा से राज्यसभा जाने का ऐलान किया और देखते ही देखते बिहार की राजनीति का तापमान बढ़ गया.
सबसे मजेदार बात यह है कि जिन विपक्षी नेताओं ने कल तक नीतीश कुमार को राजनीति से संन्यास लेने की सलाह दी थी, आज वही उनके लिए सहानुभूति के फूल बरसा रहे हैं. कल तक जो लोग कह रहे थे कि नीतीश कुमार का मानसिक स्वास्थ्य ठीक नहीं है, वही आज उनकी ‘राजनीतिक मजबूरी’ पर आंसू बहा रहे हैं. लगता है बिहार की राजनीति में सहानुभूति भी मौसम की तरह होती है, जब जरूरत हो तब बरस जाती है.
राजद के नेताओं को याद करें तो उन्होंने कई बार नीतीश कुमार के इस्तीफे की मांग की. राबड़ी देवी ने तो एक कदम आगे बढ़कर यह तक कह दिया था कि नीतीश कुमार की दिमागी हालत ठीक नहीं है और उन्हें गद्दी छोड़ देनी चाहिए. इतना ही नहीं, उन्होंने सलाह भी दे डाली थी कि नीतीश सत्ता छोड़कर अपने बेटे निशांत कुमार को मुख्यमंत्री बना दें या किसी और को जिम्मेदारी सौंप दें.
लेकिन अब जब नीतीश कुमार ने खुद मुख्यमंत्री पद से हटकर राज्यसभा जाने की इच्छा जताई और उन्होंने नामांकन भी दाखिल कर दिया, तो विपक्ष अचानक भावुक हो गया है. आरोपों का नया दौर शुरू हो गया है कि भाजपा ने दबाव बनाकर उन्हें यह फैसला लेने पर मजबूर किया है. यानी कल तक जो लोग कहते थे कि गद्दी छोड़ दीजिए, आज वही कह रहे हैं कि गद्दी क्यों छोड़ रहे हैं?
राजनीति में यह नया गणित समझना आम लोगों के लिए थोड़ा मुश्किल है. ऐसा लगता है जैसे विपक्ष को नीतीश कुमार का इस्तीफा नहीं, बल्कि इस्तीफे का श्रेय चाहिए था. अगर वे विपक्ष के दबाव में छोड़ते तो बात अलग थी, लेकिन जब उन्होंने खुद रास्ता चुना तो कहानी ही बदल गई.
बिहार की राजनीति में यह विरोधाभास नया नहीं है. यहां बयान भी परिस्थिति देखकर बदलते हैं और भावनाएं भी. कल तक जो नेता ‘त्यागपत्र दो’ का नारा लगा रहे थे, आज वही ‘अन्याय हो रहा है’, ‘साजिश हुई है’ का राग अलाप रहे हैं.
दरअसल, राजनीति में तर्क से ज्यादा महत्व अवसर का होता है और बिहार की राजनीति इस कला में काफी माहिर है. इसलिए जनता भी अब समझने लगी है कि यहां सहानुभूति, आलोचना और समर्थन सब कुछ समय और सुविधा के हिसाब से बदलता रहता है. यही शायद लोकतंत्र का सबसे दिलचस्प व्यंग्य भी है.
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