Bihar Fake UPSC Success Story: बिहार में इन दिनों आईएएस बनने की खबरें इतनी तेजी से फैल रही हैं कि लगता है मानो यूपीएससी की परीक्षा दिल्ली में नहीं, सीधे गांव के चौपाल और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में हो रही हो. भोजपुर जिले में ब्रह्मेश्वर मुखिया की पोती का शोर अभी पूरी तरह थमा भी नहीं था कि शेखपुरा के रंजीत बाबू की सफलता की गूंज सुनाई देने लगी.
आत्मविश्वास ऐसा कि लोग मान ही गए
शेखपुरा जिले से सामने आए इस मामले में एक युवक ने पूरे आत्मविश्वास के साथ खुद को भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी घोषित कर दिया. अब आत्मविश्वास इतना पक्का था कि गांव वालों को भी लगा कि जब लड़का खुद कह रहा है तो जरूर बन ही गया होगा. बस फिर क्या था, देखते ही देखते खबर पूरे इलाके में फैल गई.
कलेक्टर साहब की खबर और गांव में जश्न
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, अरियरी प्रखंड के फतेहपुर गांव के रंजीत कुमार ने पूरे आत्मविश्वास के साथ घोषणा कर दी कि उसने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा पास कर ली है और उसे ऑल इंडिया रैंक भी मिल गई है. गांव में यह खबर ऐसी फैली जैसे किसी ने लाउडस्पीकर पर बता दिया हो कि आज से गांव का एक बेटा सीधे कलेक्टर बन गया. बधाइयों का तांता लग गया, मिठाइयां बंटने लगीं और माहौल ऐसा हो गया मानो नियुक्ति पत्र भी बस रास्ते में हो.
सम्मान में नेता और पुलिस भी आगे
सम्मान समारोह का सिलसिला भी शुरू हो गया. पूर्व विधायक विजय सम्राट खुद गांव पहुंचे और “नवोदित IAS” को सम्मानित कर दिया. सोशल मीडिया पर फोटो भी पोस्ट हो गई. महुली थानाध्यक्ष समेत कई लोगों ने भी मिठाई खिलाकर बधाई दे दी. कुल मिलाकर, UPSC से ज्यादा तेजी से यहां सम्मान प्रक्रिया पूरी हो गई.
असली रिजल्ट खुला तो कहानी पलट गई
कहानी में ट्विस्ट तब आया जब कुछ लोगों ने सोचा कि चलिए जरा आधिकारिक सूची भी देख ली जाए. जैसे ही रिजल्ट की जांच हुई, पता चला कि 440वीं रैंक तो कर्नाटक के किसी रंजीथ कुमार आर (Ranjith Kumar R) की है. यानी शेखपुरा वाले रंजीत बाबू ने किसी और की मेहनत को अपना करियर बना लिया था.
पूछताछ से पहले ही दिल्ली फरार हुआ युवक
सच सामने आते ही माहौल बदल गया. थाने से संदेश आया कि जरा आधार कार्ड और एडमिट कार्ड लेकर आइए. लेकिन युवक ने सोचा कि जब तक कागज ढूंढ़े जाएं, तब तक दिल्ली की हवा खा ली जाए. बस, वह गांव से ऐसे गायब हुआ जैसे परीक्षा के बाद कई उम्मीदवार परिणाम आने से पहले ही गायब हो जाते हैं. मोबाइल भी बंद कर दिया, ताकि सवालों की घंटी न बजे.
गलती का एहसास और सोशल मीडिया की सफाई
थानाध्यक्ष रामप्रवेश भारती ने बाद में स्वीकार किया कि उनसे “भारी मिस्टेक” हो गया. उधर, जिन लोगों ने सोशल मीडिया पर बधाई की तस्वीरें डाली थीं, वे भी अब उन्हें धीरे-धीरे हटाने में लगे हैं, क्योंकि इंटरनेट याद रखता है, लेकिन लोग भूल जाना चाहते हैं.
खबर से पहले सत्यापन जरूरी
इलाके में अब यह घटना चर्चा का विषय है. लोग कह रहे हैं कि यहां IAS बनने का सबसे तेज रास्ता शायद परीक्षा नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और सोशल मीडिया है. हालांकि, इस पूरे प्रकरण ने एक सबक जरूर दे दिया कि आज के दौर में खबर से पहले सत्यापन कर लेना ही सबसे बड़ी समझदारी है.
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