Global War Impact on Medicines: पश्चिम एशिया में जारी युद्ध का असर अब केवल तेल और गैस तक सीमित नहीं रहा है. वैश्विक सप्लाई चेन में आई बाधाओं के कारण दवाइयों की उपलब्धता और कीमतों को लेकर भी चिंता बढ़ने लगी है. भारत, जो दुनिया का बड़ा जेनेरिक दवा उत्पादक माना जाता है, उसके सामने भी नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं. विशेषज्ञों और सरकारी अधिकारियों का कहना है कि अगर युद्ध लंबे समय तक जारी रहा तो दवाइयों की कीमतों और आपूर्ति दोनों पर असर पड़ सकता है.
दरअसल, भारत की फार्मा इंडस्ट्री बड़ी मात्रा में कच्चे माल, यानी एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडिएंट्स (API) और अन्य रसायनों के आयात पर निर्भर है. इनमें से काफी हिस्सा चीन और कुछ अन्य देशों से आता है. मौजूदा वैश्विक तनाव और युद्ध के माहौल का हवाला देकर इन कच्चे माल की कीमतों में अचानक तेज बढ़ोतरी देखने को मिल रही है. कई प्रमुख दवा रसायनों की कीमतें पिछले कुछ समय में काफी बढ़ चुकी हैं, जिससे दवा कंपनियों की उत्पादन लागत भी बढ़ रही है.
दूसरी बड़ी समस्या लॉजिस्टिक्स और सप्लाई रूट से जुड़ी है. युद्ध के कारण कई समुद्री मार्ग और हवाई रास्ते प्रभावित हुए हैं, जिससे दवाइयों और कच्चे माल की ढ़ुलाई महंगी और धीमी हो गई है. रिपोर्ट के अनुसार, शिपिंग लागत और माल ढ़ुलाई शुल्क कई गुना बढ़ गए हैं, जिससे दवा उद्योग पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव पड़ रहा है.
फार्मास्यूटिकल्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (Pharmexcil) से जुड़े अधिकारियों ने भी चेतावनी दी है कि अगर हालात जल्द सामान्य नहीं हुए तो भारत के दवा निर्यात पर करीब 2500 से 5000 करोड़ रुपये तक का असर पड़ सकता है. पश्चिम एशिया भारत के फार्मा निर्यात के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार है और वहीं से कई सप्लाई रूट भी गुजरते हैं.
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि फिलहाल देश में दवाइयों की तत्काल कमी की स्थिति नहीं है, लेकिन सरकार स्थिति पर नजर रखे हुए है. जरूरत पड़ने पर वैकल्पिक सप्लाई रूट, कच्चे माल के भंडारण और घरेलू उत्पादन बढ़ाने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा संकट भारत के लिए एक बड़ा सबक भी है. लंबे समय से दवा उद्योग में कच्चे माल के लिए विदेशी निर्भरता कम करने की जरूरत महसूस की जा रही थी. अब सरकार और उद्योग दोनों इस दिशा में तेजी से काम करने की बात कर रहे हैं, ताकि भविष्य में किसी वैश्विक संकट का असर देश की दवा आपूर्ति पर कम पड़े.
संक्षेप में कहें तो तेल और गैस के बाद अब दवाइयों को लेकर भी चिंता बढ़ गई है. हालांकि, फिलहाल स्थिति नियंत्रण में बताई जा रही है, लेकिन युद्ध लंबा खिंचने पर भारत सहित दुनिया के कई देशों के लिए यह नई स्वास्थ्य-आर्थिक चुनौती बन सकती है.
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