Voter Adhikar Yatra: बिहार में कांग्रेस के नेतृत्व में ‘वोटर अधिकार यात्रा’ 17 अगस्त से शुरू होकर 1 सितंबर को पटना में सम्पन्न हुई. यह 14 दिनों की यात्रा 1300 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए 24 जिलों और 50 विधानसभा क्षेत्रों से होकर गुज़री, जिसमें 110 से अधिक सीटें कवर की गईं, जिनमें से लगभग 80 NDA के गढ़ माने जाने वाले थे.
विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने यात्रा को लोकतंत्र की रक्षा का अभियान बताया, जिसमें चुनाव आयोग और NDA पर ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाया गया. इंडिया गठबंधन में शामिल RJD, CPI-ML और VIP जैसे दलों ने भी यात्रा में सहभागिता की. राहुल-तेजस्वी और अखिलेश के मंच साझा करने से विपक्षी एकता को जोड़ने की कोशिश को दिखाया गया.
सांसद पप्पू यादव ने कहा कि यात्रा ने राहुल गांधी की लोकप्रियता और विश्वास दोनों में नवजीवन फूंका है और लोकतंत्र को मजबूत करने का संदेश दिया है. AICC महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला ने चुनावी गड़बड़ियों और वोटर सूची में फेरबदल के खिलाफ आक्रोश जताया और यात्रा को ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर समर्थन प्राप्त होने का प्रमाण बताया.
वहीं, बिहार के डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा ने इस यात्रा को “नौटंकी” करार दिया और कहा कि ये लोकतंत्र विरोधी हैं और जनता उन्हें स्वीकार नहीं करेगी. मंत्री अशोक चौधरी ने दावा किया कि यात्रा में जो भी शामिल हुए, वे वोटर में तब्दील नहीं होंगे और RJD के साथ कांग्रेस के गठजोड़ को विफल बताया.
विश्लेषकों के अनुसार, यह यात्रा कांग्रेस के लिए बिहार में सक्रियता और ‘बार्गेनिंग पावर’ बढ़ाने का माध्यम रही. पार्टी ने यात्रा के माध्यम से सत्ता समीकरण में अपनी स्थिति मजबूत की है, खासकर सीट शेयरिंग वार्ता में इसका लाभ मिल सकता है. यात्रा ने मतदाता जागृति तो पैदा की, लेकिन असली परीक्षा यह होगी कि यह जन-जागरण वोट में तब्दील हो पाता है या नहीं.
इस तरह, ‘वोटर अधिकार यात्रा’ ने बिहार में महागठबंधन की सक्रियता और जोश को उजागर किया. विपक्ष इसे जनता के अधिकार की रक्षा की जनआंदोलन मानता है, वहीं सत्तापक्ष इसे चुनावी रणनीति और नौटंकी करार देता है. अब बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम ही तय करेंगे कि इस यात्रा का वास्तविक राजनीतिक प्रभाव कितना हुआ.
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